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शनिवार, 12 अप्रैल 2014

खेलोगे, कूदोगे होगे ख़राब, पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब

                                                                                                              चित्र साभार : फ्लिकर
परीक्षाओं का दौर शुरू है, छात्र-छात्राओं पर बहुत ही दबाव बना हुआ है, कुछ दिनों में परीक्षा का निकाल भी आने लगेगा। यह दौर बेहद ही नाजुक होता है। संवेदनशील होता है। इन दिनों में समाचार पत्रों में, आस-पड़ोस में तरह-तरह के खबरें पढ़ने-सुनने को मिल जाते हैं। 
वक़्त बदल गया है, परिवेश भी बदल गए है, तो आखिर परवरिश का तरीका कब बदलेगा? तरीका न बदले न सही, कोई बड़ी बात नहीं। पर सोच, समझ एवं व्यवहार जरूर ही बदलना होगा। जनेरेशन गॅप मिटाना बहुत ही आवश्यक हो गया है। आज की युवा बहुत सारी सम्भावनाओं को तलाशने लगी है। उनके पास जानकारी का भंडार सा आ गया है। ये तकनीकी युग है। आज से १५-२० साल पहले तक जो बातें, जो जानकारी हम तक अपनी पहुँच नहीं बना पाती थीं, आज हर किसी के उँगलियों की नोक पर है। यही है क्रांति, तकनिकी क्रांति। ऐसी ही एक क्रांति अब अभिभावकों को, शिक्षकों को और समूचे समाज को भी लानी होगी, अपनी सोच में, अपने समझ में। बदलते समय के साथ सभी को बदलना होगा। युवा वर्ग को ये बदलाव विरासत में मिल रही है। परन्तु इस बदलाव का अभिभावकों द्वारा, शिक्षकों द्वारा, समाज द्वारा नजरअंदाज करना दुर्भाग्यपूर्ण साबित होता जा रहा है। आज की युवा पीढ़ी बड़ों के प्रति सम्मान, आदर का निर्वहन करती जरूर है, परन्तु अब उसे बड़ों द्वारा तुगलकी फरमान सुनना नहीं भात। क्रांति का दौर है, बगावत कर बैठते हैं। आज की युवा को पर्सनल स्पेस की दरकार है। अपनी पसंद, नापसंद जताने का अधिकार चाहते हैं। चाहते हैं कोई उनकी बात सुने, समझे। वो अपना सही-गलत खुद तय करना चाहते हैं। क्यों? क्योंकि उनके पास जानकारियों का भंडार है। समझ है। तकनीकी है। पहुँच है। वो आत्मनिर्भर होना चाहते हैं। उन्हें मार्गदर्शन चाहिए, परन्तु ऊँगली पकड़कर चलना उनके लिए बीते दिनों की बात हो गयी है। तो क्या ये गलत है? क्यों है ये गलत?

इस युग में जब हम आधुनिक तकनीकी के जरिये यंत्रों को आत्मनिर्भर बनाने की अथक कोशिश में हैं, तो क्या इंसानी बच्चों को आत्मनिर्भरता की दरकार नहीं होनी चाहिए? यंत्रों को तो हम दिन-ब-दिन बेहतर से बेहतरीन बनाते जा रहे हैं। यंत्रों की बुद्धिमत्ता लगातार विकसित किये जा रहे हैं। परन्तु क्या उतनी ही तेजी और सजगता से हम अपनी सोच को समय के साथ बदल पा रहे हैं, बेहतर कर पा रहे हैं? यदि कर सकें तो इसी में भलाई है। क्योंकि वक़्त तो तेजी से बदलते जा रहा है। उतनी ही तेजी से आने वाली पीढ़ी भी इस बदलाव में ढलती-घुलती जा रही है। एक छोटा सा उदहारण है की महज एक-डेढ साल का अबोध बच्चा मोबाइल का उपयोग बखूबी करने लगा है। सर मत खुजाइये, यही सच है। यकीन न आये तो खुद पता लगा लीजिये, ऐसा ही पाएंगे। बच्चे बहुत ही कम उम्र में बहुत कुछ सीखते जा रहे हैं। उनकी रूचि-अरुचि भी बदलती जा रही है, आज उन्हें कुछ पसंद है, तो कल कुछ और ही। 

हम जीव हैं, इंसान हैं, माँ के गर्भ से जन्मे हैं, किसी साँचे से ढल कर नहीं निकले हैं की हर कोई हूबहू एक सरिका हो। हर किसीका अपना व्यक्तित्व होता है, अपना वजूद होता है। अपनी पसंद-नापसंद होती है। सब की समझ, बुद्धि एवं काबिलियत भी एक सी नहीं होती। कोई चाहत रखना एक बात है, और उस चाहत का पूरा होना न होना एकदम ही अलग। सभी चाहते हैं की उनके बच्चे पढ़-लिख कर एक अच्छा भविष्य बनाये। इसमे कोई गलत बात नहीं है। परन्तु बच्चों पर अपनी ये चाहत थोपना की मेरा बेटा या मेरी बेटी डाक्टर बनें, इंजीनियर बने, आइ. एस. बने, विदेश जाये, या मेरे बिज़नेस में मेरा हाथ बंटाए कहाँ तक सही है। ऐसा करना बच्चों को दबाव में डालना है। उनके रूचि के विरुद्ध, उनकी काबिलियत के विरुद्ध। कई दफ़ा बच्चे भी समझते हैं की माता-पिता को उनके बेहतर भविष्य की फ़िक्र है, और वे भरसक प्रयत्न भी करते हैं की माँ-पिता के सपनों को साकार कर सकें। कई कर भी लेते हैं। कई नहीं भी कर पाते। जो कर पाते हैं उन्हें सिर-आँखों पर बिठा लिया जाता है। जो बिचारे नहीं कर पाते वो नालायक, निकम्मों की उपाधियों से लाद दिए जाते हैं। 

हम ये भूल जाते हैं की हम भी प्रकृति के नियमों से बँधे हैं, हमारा आचार-विचार, हमारी बुद्धि, हमारी समझ ये सब परिस्थितिजन्य होती हैं।इंसान बुद्धिमान होने के साथ ही साथ अति भावुक भी होता है। उसका हर कदम, हर निर्णय, भावनाओं से प्रभावित रहते हैं। भावनायें जहाँ हमें हिम्मती बनाते हैं, वहीँ हमें बेहद कमजोर, असहाय भी कर देती हैं। हमारी भावनाओं का स्वस्थ रहना बेहद ही जरुरी है। जहाँ हमारी भावना दूषित हुई, हमारा व्यवहार भी दूषित हो जाता है। कहते हैं न की मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। यही प्रयत्न होना चाहिए की मन में कभी भी, किसी भी तरह का खटास पैदा न होने पाये। जब मन टूट जाता है, तब बुद्धि, विवेक, चातुर्य, समझ किसी काम नहीं आते, बेबस हो जाते हैं। तो यही कोशिश करें की अपनी इच्छाओं, आकांछाओं को बच्चों के मन:पटल पर इस कदर न थोपें की उनका मन कचोट उठे, तड़प उठे। चोटिल मन सही निर्णय नहीं कर पाता। चोटिल मन प्राणघातक हो जाता है। उसे अच्छे-बुरे की समझ नहीं रहती। सर्वत्र अँधकार ही अँधकार फैल जाता है, उजियारे का कहीं नामों-निशाँ नहीं रह पाता। टुटा हुआ मन जीवन की डोर तोड़ते देर नहीं करता। संकोच भी नहीं। अनुनय-विनय भी नहीं। तो सजग हो जाएँ, सचेत हो जाएँ कि कहीं आप भी किसी कोमल मन को कुण्ठित तो नहीं कर रहे? किसी मन पर अनावश्यक बोझ तो नहीं डाल रहे? अपनी चाहत, उम्मीद, मान-सम्मान के बोझ तले तो नहीं दबा रहे? संभल जाएँ इससे पहले की कहीं कोई देर न हो जाये। ये बात जाहिर कर दें की हम चाहते हैं की तुम जीवन में खूब तरक्की करो। परन्तु तुम्हारी ख़ुशी, तुम्हारी पसंद से ऊपर हमारे लिए कुछ भी नहीं। खुद को भी एक बात समझा लें की संसार में धन-दौलत, ऐश्वर्य-शोहरत ही सब कुछ नहीं होता, आत्म-शांति, आत्म-संतुष्टि से ज्यादा कीमती और कुछ नहीं। वो कहते हैं न की मन चंगा, तो कठौती में गंगा। 

                                                                                                                                              चित्र साभार : विकिपीडिआ 

गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

तितली-सा मासूम बचपन (Don't Grow Up, It's a Trap)

                                                                                                   चित्र साभार : विकिपीडिआ

 तितली का वजूद उसकी मासूमियत में है, सुंदरता में है, स्वच्छन्दता में है। फिर ये कैसी महत्त्वकांक्षा है? ये कैसा डर है? जिंदगी से बढकर महत्त्वकांक्षा? जीवन का मोह नहीं, समाज का, प्रतिष्ठा का डर। किसके लिए ये दिखावा? कच्चे घड़े में पानी भरने कि क्या अनावश्यक जल्दबाजी? तितली से शहद बनवाने कि ये जिद क्यों? बछड़ों को जुए में जोड़ने कि जल्दबाजी क्यों? कहते हैं कि सब्र मीठा फल देती है तो फिर ये छटपटाहट क्यों? नहीं, नहीं, सख्ती से नहीं नरमी से काम लो भई!

बच्चों का मन तितली कि तरह होता है। बच्चे जब तक अपनी धुन में रमें रहते हैं, और कोई टोका-टाकी नहीं करता, वो मस्त हो रमते रहते हैं। तितली कि ही तरह कभी इस फूल, कभी उस। कभी इस बगिया, कभी उस। खूशबू और सौंदर्य कि संगत में रहते-रहते तितली भी कितनी ख़ूबसूरत हो जाती है। फूलों सी ही नाजुक। कोमल। चंचल। मोहक। पर आह! फूलों ही कि तरह क्षण-भंगुर भी। जरा सा आघात, और वजूद नष्ट। तितली का वजूद स्वच्छंद हो रमते रहने में है। फूलों संग अठखेलियाँ करने में है। तितली को आलिंगन नहीं पसंद। आलिंगन में बंधन का, स्वामित्व का बोध होता है। तितली को बंधन नहीं पसंद। उसे स्वछन्द हो फूलों को चूमना खूब भाता है। चुम्बन में बंधन नहीं। उसे हवा के संग निर्भीक हो झूलना भाता है।उसे जंगलों-पहाड़ों में विचारना भी अच्छा लगता है। नदी कि कल-कल संगीत में झूमना भी अच्छा लगता है। पत्थरों, चट्टानों पर बैठना भी अच्छा लगता है।  तितली को पकड़ने की, कैद करने की चेष्ठा मूर्खता है। घोर मूर्खता। तितली को बागों में समेट कर नहीं रखा जा सकता। 

एक किस्से में पढ़ा था की किसी समय कोई किट कृमिकोष से निकलकर एक तितली के रूप में परिवर्तित होने को लालायित था। किसी व्यक्ति ने कृमिकोष से बहार निकलते तितली को संघर्ष करते हुए देखा। उससे तितली का वो संघर्ष देखा नहीं जा रहा था, तितली को हो रहा यह कष्ट उससे बर्दाश्त नहीं हो रहा था, उसने सहायता करने की ठानी और एक पतली छड़ी की मदद से तितली की कृमिकोष से निकालने में सहायता की। तितली जल्द ही कृमिकोष से बहार आ गयी। एक नए संसार में। उस व्यक्ति ने अब एक राहत की सांस ली।  वह व्यक्ति बहुत ही प्रसन्न हुआ। कुछ क्षण उत्सुकता-वश वह तितली को निहारता रहा। उसे लगा की तितली अब उड़ी की तब उड़ी। वह देखता रहा। कुछ समय बीत जाने के बाद भी तितली रेंगती ही जा रही थी। उसने ध्यान दिया तो उसने देखा की तितली के पंख ठीक से खुल नहीं पाए हैं। सहसा ही उसे यह अहसास हुआ की कहीं उस छड़ी से तो कोई आघात नहीं लग गया। अरे! यह क्या हो गया मुझसे। अब उसे यह अहसास हो चुका की कृमिकोष से बहार निकलने की स्वाभाविक प्रक्रिया में नाहक ही हस्तक्षेप किया। उसने एक मासूम तितली को असहाय बना दिया। ऐसी सहायता किस काम की जिसने इस सुन्दर, मोहक, चंचल, अबोध तितली को जीवन भर के लिए लाचार बना दिया? 

अब वह युग नहीं रहा की लोहार का बच्चा लोहार, सोनार का बच्चा सोनार। अब शिक्षा परम्परागत घरेलू व्यवसाय सिखना भर नहीं रहा। शिक्षा अब विद्यालयों में अपना घर बना चुकी है। समाज में यह बदलाव आधुनिकता बदलाव की देन है। शिक्षा परम्परागत दक्षता या योग्यता के आधारबिंदु पर नहीं, बल्कि बच्चे की व्यक्तिगत रूचि, योग्यता एवं विवेक के आधार पर होना चाहिए। शिक्षा सहज होना चाहिए।  सरल होना चाहिए। शास्‍त्रों में उल्लेख है कि 'अति वर्जस्‍य सर्वत्र', आज की शिक्षा प्रणाली पर यह उक्ति पूरी तरह सटीक बैठता है। शिक्षा प्रतिस्पर्धा बना दी गई है। घुड़दौड़। अभिभावक, शिक्षक एवं समाज - घुड़सवार। बच्चे - घोड़े। प्राचीन-काल में विदेशों से घोड़े आयत किये जाते थे। अब विद्यार्थी निर्यात किये जाते हैं। तब तक्षशीला हुआ करता था अब हारवर्ड, कैंब्रिज। तब शिक्षा निर्यात की जाती थी, अब आयात। अभूतपूर्व, अविश्वसनीय, प्रचण्ड - दबाव। दबाव प्रतिस्पर्धा का, दबाव मान-सम्मान का, दबाव अव्वल रहने का और दबाव उम्मीद का। इन सभी दबाव के बीच बच्चे की मन:स्थिति, बच्चे की इच्छा, बच्चे का रूझान दबा ही रह जाता है। जडवत। जैसे अंगद के पैरों तले आ गया हो। 

तारे ज़मीन पर, थ्री इडियट्स तथा उड़ान जैसी फिल्में कोर-कल्पित नहीं वरन समाज के ही दर्पण हैं। और दर्पण जहाँ सुन्दरता,कोमलता दिखाता है, वहीँ घिनौना सच (चेहरा) भी। कितनी भी आँखें बंद कर लें, परदे लगा लें। मानें ना मानें। एक हद के बाद बच्चे दबाव झेल नहीं पाते। टूटने लगते हैं। बिखरने लगते हैं। बिलखने लगते हैं। लेकिन उनका बिलखना नजरअंदाज़ कर दिया जाता है। गीता पाठ पढ़ाया जाता है। कसमें दिलाई जाती हैं। दुहाई दी जाती है। इन सब हथकण्डों से काम न चला तो चाबुक तैयार! कच्चा बाँध पानी की धार आखिर कब तक संभाल सकता है। टूट ही जाता है। मुर्छित। अस्तित्व विहीन। फिर पानी ही पानी। हाहाकार। मातम। पछतावा। दोषारोपण। अधूरापन। शून्यता। कोई शिक्षा नहीं। फिर वही जीवन। फिर वही मरण। 

इस शोषण से उत्थान हेतु कौन मसीहा आएगा? क्या कहा? यह शोषण नहीं है? यही जरुरी है? यही उत्थान है? यही परम्परा है? बहुत खूब। जो संसार के सुन्दर, मासूम भविष्य को सूली पे चढ़ा दे। वाह क्या खूब परम्परा है ये भी! वाह क्या बढियां उत्थान है ये! बहुत खूब! Bravo!!!

                                                                                                            चित्र साभार : flickr